Chaitra Navratri 2026 Day 1: मां शैलपुत्री व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र और महत्व

Navratri 2026 Day 1: जानें मां शैलपुत्री की व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, शुभ रंग और भोग। पढ़ें नवरात्रि के पहले दिन का महत्व और सही पूजा तरीका।

Published On 2026-03-18 16:23 GMT   |   Update On 2026-03-18 16:23 GMT

चैत्र नवरात्रि 2026 Day 1: मां शैलपुत्री व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व

चैत्र नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है, जो मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप मानी जाती हैं। साल 2026 में यह दिन 19 मार्च को पड़ेगा और इसी दिन से नवरात्रि की शुरुआत होती है। शास्त्रों के अनुसार मां शैलपुत्री को हिमालय की पुत्री हैं, जो हिमालय पर्वतों का राजा हैं। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना करने के साथ विधिवत तरीके से शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इसके साथ ही इस व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करना चाहिए। आइए जानते हैं मां शैलपुत्री की संपूर्ण व्रत कथा

मां शैलपुत्री का स्वरूप

मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और करुणामयी है। इनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित रहता है, जबकि वे नंदी बैल (वृषभ) पर आरूढ़ हैं। इनके मस्तक पर अर्धचंद्र विराजमान है, जो दिव्य ज्ञान और आकर्षण का प्रतीक माना जाता है।

मां शैलपुत्री की कथा (Maa Shailputri Vrat Katha)

मां शैलपुत्री को देवी सती के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार प्रजापति दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया और सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। देवी सती को विश्वास था कि उन्हें बुलाया जाएगा, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वे व्याकुल हो उठीं। भगवान शिव ने बिना निमंत्रण यज्ञ में जाने से मना किया, परंतु सती के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने उन्हें जाने की अनुमति दे दी। जब सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि वहां कोई भी उनका आदर नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने स्नेहपूर्वक उनका स्वागत किया, जबकि उनकी बहनों ने उनका उपहास किया और भगवान शिव का भी अपमान किया। स्वयं दक्ष ने भी उनका और उनके पति का तिरस्कार किया। यह सब देखकर सती अत्यंत दुखी और आहत हो गईं। अपने और अपने पति के अपमान को सहन न कर पाने के कारण उन्होंने उसी यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर प्राण त्याग दिए। जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला, तो वे शोक और क्रोध से भर उठे। उन्होंने यज्ञ को नष्ट कर दिया। इसके बाद सती ने हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया, जिस कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा।

पूजा विधि (Day 1)

सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लें

कलश स्थापना (घटस्थापना) करें

मां शैलपुत्री की मूर्ति/चित्र स्थापित करें

गंगाजल, फूल, अक्षत, धूप-दीप अर्पित करें

घी से बना भोग (जैसे देसी घी) चढ़ाएं

मंत्र जाप करें

मंत्र:

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः

दिन का रंग और भोग

शुभ रंग: पीला

भोग: घी या घी से बनी मिठाई

Tags:    

Similar News