शनि देव, माता पार्वती और योगीन्द्र की कथा: श्राप के बाद कैसे बने ग्रहों के राजा? | गणेश पुराण की रोचक कहानी

हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान शनिदेव को कर्मफलदाता और न्याय के देवता के रूप में जाना जाता है। उनके जीवन से जुड़ी कई रोचक कथाएं पुराणों में वर्णित हैं, जिनमें से एक कथा गणेश पुराण में मिलती है। यह कथा उस समय की है जब माता पार्वती ने भगवान गणेश के प्राकट्य पर एक भव्य उत्सव का आयोजन किया था और सभी देवी-देवता बाल गणेश के दर्शन के लिए कैलाश पहुंचे थे। इसी दौरान शनिदेव भी वहां उपस्थित हुए, लेकिन पत्नी के श्राप के कारण वे सिर झुकाकर खड़े रहे। माता पार्वती के आग्रह पर जब उन्होंने बाल गणेश को देखा, तो एक अनहोनी घटित हो गई, जिसके बाद माता पार्वती क्रोधित हो उठीं और शनिदेव को कठोर श्राप दे दिया।

Published On 2026-06-18 14:54 GMT   |   Update On 2026-06-18 14:54 GMT

शनि देव, माता पार्वती और योगीन्द्र की कथा: श्राप से कैसे मिला दिव्य पद?

गणेश पुराण में वर्णित एक पौराणिक कथा के अनुसार, शनि देव एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव, माता पार्वती और बाल गणेश के दर्शन के लिए पहुंचे। यह कथा कर्म, विनम्रता और दिव्य कृपा के महत्व को दर्शाती है। ऐसे ही एक भगवान शनि देव से संबंधित कथा है। श्रीगणेश पुराण में वर्णित माता पार्वती और शनिदेव का प्रसंग भी कुछ ऐसा ही है। ये वह कथा है जब एक अनजानी भूल के कारण मां पार्वती से शनिदेव को श्राप दे दिया था। लेकिन जब वह शांत हुई, तो उन्होंने शनिदेव को योगीन्द्र और ग्रहों का राजा बना दिया था। आइए जानते हैं ‘धर्म गाथा’ की श्रृंखला में इस दिव्य कथा के बारे में जब माता पार्वती के कोप से शनिदेव का अंग-भंग हो गए थे और फिर उन्हें मिला योगियों में श्रेष्ठ होने का वरदान….श्रीगणेश पुराण के सप्तम अध्याय में मां पार्वती अपने पुत्र गणेश के प्राकट्य के उपलक्ष्य में एक भव्य उत्सव का आयोजन करती हैं और इस बालक को देखने के लिए देवी-देवता आते हैं। ऐसे में शनिदेव की आते हैं। लेकिन उनकी पत्नी के द्वारा मिले श्राप के कारण वह सिर झुकाएं हुए खड़े थे। लेकिन मां पार्वती के कहने पर उन्होंने जैसे ही गणेश जी को देखा, तो उनका सिर छिन्न हो जाता है। ऐसे में मां पार्वती के व्याकुल होने पर श्री हरि विष्णु, शिव जी सहित अन्य देवी-देवता प्रयत्न करके गणेश जी को देखा, तो उनका सिर छिन्न हो जाता है। ऐसे में मां पार्वती के व्याकुल होने पर श्री हरि विष्णु, शिव जी सहित अन्य देवी-देवता प्रयत्न करके गणेश जी से सिर में गजानन का सिर लगा देते हैं। लेकिन फिर भी मां पार्वती का गुस्सा शांत नहीं होता है।

शनिदेव को पार्वती का श्राप

शनि देव अब भी अपना सिर नीचा किए हुए खड़े। वे संकोच के कारण न तो जा सके और न उत्सव में ही भाग ले सके। तभी पार्वतीजी की दृष्टि शनिदेव पर पड़ी तो उन्हें क्रोध हो आया और उन्होंने शनिदेव को श्राप देते हुए कहा कि ‘तू सभा के मध्य ही अंगहीन हो जा। सूर्यदेव, कश्यप तथा यमराज का पार्वती पर क्रोधित होना मां पार्वती का इस तरह से सूर्यपुत्र को श्राप देने से सूर्य देव भी क्रोधित हो जाते हैं और वह कहते हैं कि सभी उपस्थित सज्जन देख लें कि गिरिजा ने मेरे पुत्र को व्यर्थ ही श्राप दिया है। उस बेचारे का थोड़ा सा दोष नहीं था। वह मात्र गणेश जी के दर्शन करने आया था और मां पार्वती की आज्ञा के बाद देखाथा। फिर अब, जबकि बालक पुनर्जीवित हो गया और उसी उपलक्ष्य में उत्सव भी मनाया जा रहा है, तो इस अवस्था में उसे श्राप देने का प्रयोजन ही क्या था

माता पार्वती की शरण में शनिदेव

ब्रह्माजी के समझाने पर महर्षि कश्यप और सूर्यदेव ने पुनः तर्क रखा कि शनिदेव तो पहले से ही पत्नी के शाप से दृष्टि-दोषी थे और मां पार्वती की आज्ञा के बाद ही उन्होंने बालक को देखा था। अतः जब तक उनके पुत्र के अंग-भंग (लंगड़ापन) के श्राप को रोका नहीं जाता, तब तक शांति संभव नहीं है। तब ब्रह्माजी ने शनिदेव से कहा, “ग्रहेश्वर! तुम तुरंत ही देवी पार्वती की शरण में चलो। तुम्हारे श्राप का निवारण उन्हीं की कृपा से संभव है। इसके बाद सभी माता के पा पहुंचे और उनसे कहा कि इस निर्दोष के श्राप का प्रतिकार होना आवश्यक है।

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