महाभारत कथा: अभिमन्यु की मृत्यु का कारण कैसे बना जयद्रथ? जानें शिवजी के वरदान और चक्रव्यूह का रहस्य

महाभारत में अभिमन्यु की मृत्यु के पीछे जयद्रथ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जानें भगवान शिव के वरदान ने कैसे जयद्रथ को एक दिन के लिए पांडवों को रोकने की शक्ति दी और कैसे उसी कारण चक्रव्यूह में अभिमन्यु अकेले पड़ गए। पढ़ें महाभारत की यह प्रसिद्ध कथा।

Published On 2026-06-22 16:54 GMT   |   Update On 2026-06-22 16:54 GMT

महाभारत कथा: अभिमन्यु की मृत्यु का कारण कैसे बने जयद्रथ और शिवजी का वरदान?

महाभारत की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक अभिमन्यु का वीरगति प्राप्त करना माना जाता है। अभिमन्यु ने कम आयु में ही अद्भुत पराक्रम दिखाया, लेकिन चक्रव्यूह में घिर जाने के कारण उन्हें वीरगति प्राप्त हुई। पौराणिक कथा के अनुसार इस घटना में जयद्रथ और उन्हें प्राप्त एक विशेष वरदान की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

सिन्धु देश का महायस्‍वी राजा जयद्रथ, जो भगवान शिव से मिले वरदान के कारण अर्जुन को छोड़कर हर एक पांडव और उनकी सेना को एक दिन के लिए रोक पाने में सफल हुआ। यह कथा महाभारत ग्रंथ के वनपर्व और द्रोण पर्व में वर्णित है। द्रौपदी-हरण के प्रयास में अपमानित होने के बाद सिंधु नरेश जयद्रथ ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। आइए ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में आज जानते हैं कैसे जयद्रथ बना अभिमन्यु के वध का कारण…

कौन था जयद्रथ?

सिन्धु देश का महायस्‍वी राजा जयद्रथ वृद्धक्षत्र का पुत्र था। उसने कौरवों के सम्राट दुर्योधन की बहन दुशाला से विवाह किया था।

जयद्रथ ने की द्रौपदी का हरण करने की कोशिश

महाभारत के वनपर्व में दी गई कथा के अनुसार, जब पांडव 12 वर्ष के वनवास में थे। तब शत्रुओं को संताप देने वाले पांचों पांडव उद्यत तपस्‍वी पुरोहित धौम्य तथा महर्षि तृणबिन्दु की आज्ञा से द्रौपदी को अकेले ही आश्रम में छोड़कर ब्राह्मणों की रक्षा के लिए हिंसक पशुओं को मारने एक साथ चारों दिशाओं में चले गए। उसी समय सिन्‍धु देश का महायस्‍वी राजा जयद्रथ विवाह की इच्‍छा से शाल्व देश की ओर जा रहा था। वह जैसे ही काम्यवन पहुंचा, तो उसकी दूर से नजर द्रौपदी पर पड़ी। वह परम सुन्दर रूप धारण किए अपनी अनुपम कांति से उद्भासित हो रही थी। द्रौपदी को देखकर जयद्रथ के मन में दूषित भावना का उदय हुआ। फिर उसने द्रौपदी का हरण करने की कोशिश की। लेकिन बाद में पांडवों ने उसे पकड़कर लिया और जयद्रथ की सेना का संहार किया। इसके बाद भीम द्वारा जयद्रथ को बंदी बना लिया गया और युधिष्ठिर के सामने उपस्थित हो किया। लेकिन उन्होंने दुशाला का पति होने के कारण छोड़ दिया।

जयद्रथ ने की कठोर तपस्या

युधिष्ठिर के द्वारा लज्जित होकर जयद्रथ वहां से चला गया और वह घर न जाकर गंगाद्वार यानी हरिद्धार का ओर चल दिया। वहां पहुंचकर उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या आरंभ की।

भगवान शिव ने प्रसन्न होकर दिया ये वरदान

जयद्रथ की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उससे वर मांगने को कहा। तो जयद्र ने कहा ‘मैं रथ सहित पांचों पांडवों को युद्ध में जीत लूं। इस वर के मांगने पर भगवान शिव ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता। पांडव अजेय और अवध्‍य हैं। तुम केवल एक दिन युद्ध में महाबाहु अर्जुन को छोड़कर अन्‍य चार पांडवों को आगे बढ़ने से रोक सकते हो।

वर्षों बाद जयद्रथ को मिला वरदान हुआ सिद्ध

वर्षों बाद कुरुक्षेत्र के युद्ध में यही वरदान निर्णायक सिद्ध हुआ। युद्ध के तेरहवें दिन आचार्य द्रोण ने चक्रव्यूह की रचना की। उस समय इन लोगों ने अर्जुन और श्रीकृष्ण को युद्ध भूमि के दूसरे भाग में उलझा दिया गया था। पांडव पक्ष में केवल अभिमन्यु ही ऐसा योद्धा था जो चक्रव्यूह में प्रवेश करना जानता था। यद्यपि उसे बाहर निकलने की पूरी विधि ज्ञात नहीं थी, फिर भी उसने युद्ध धर्म निभाने के लिए चक्रव्यूह भेदने का निर्णय लिया।

ऐसे में पांडवों ने योजना बनाई कि अभिमन्यु चक्रव्यूह का द्वार तोड़ेगा और उसके पीछे-पीछे भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव सहित अन्य योद्धा प्रवेश करेंगे। लेकिन यहीं पर जयद्रथ ने अपना दांव खेला। जैसे ही अभिमन्यु भीतर गया, जयद्रथ चक्रव्यूह के द्वार पर आकर खड़ा हो गया। शिव के वरदान के प्रभाव से उसने अकेले ही पांडवों और उनकी सेना को रोक दिया। भीम जैसे महाबली और अन्य योद्धा भी उस दिन जयद्रथ को हिला पाने में असफल हो गए।

अर्जुन पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु

जयद्रथ के कारण अकेले अभिमन्यु ही चक्रव्यूह में प्रवेश कर पाया। जहां पर पहले से ही द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा और दुर्योधन सहित कई महारथी थे और उन्होंने अकेले अभिमन्यु पर आक्रमण कर दिया। एक साथ इतने योद्धाओं ने अकेले अभिमन्यु ने युद्ध किया। लेकिन अंत में उन्होंने वीरगति प्राप्त की।

अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ का वध

अभिमन्यु के वध की खबर सुनते ही अर्जुन क्रोध से भर उठे और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध न कर सके तो स्वयं अग्नि में प्रवेश कर लेंगे। इसके बाद 14वें दिन भीषण युद्ध हुआ और सूर्यास्त से पहले भगवान कृष्ण की सहायता से जयद्रथ का वध किया और अपने पुत्र की मृत्यु का प्रतिशोध लिया।

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