गणेश पुराण कथा: चंद्रमा को क्यों मिला था भगवान गणेश का श्राप? जानें पूरी कहानी
जानें गणेश पुराण में वर्णित वह रोचक कथा, जब चंद्रमा को अपने अहंकार के कारण भगवान गणेश का श्राप मिला। पढ़ें चंद्र दर्शन और गणेश चतुर्थी से जुड़ी मान्यताएं।
गणेश पुराण कथा: चंद्रमा को क्यों मिला था भगवान गणेश का श्राप?
हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान गणेश और चंद्रदेव से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार चंद्रमा को अपने सौंदर्य और तेज का बहुत अभिमान था। इसी अहंकार के कारण उन्हें भगवान गणेश के श्राप का सामना करना पड़ा। ऐसे ही एक काफी रोचक कथा है जो प्रथम पूज्य श्री गणेश और चंद्रमा से संबंधित है। चंद्र देव को अपने तेज और सौंदर्य को लेकर काफी अहंकार था, जिसके कारण उन्हें भगवान गणेश से श्राप का भागी होना पड़ा। इस श्राप से निजात पाने के लिए उन्होंने 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिससे उन्हें पुन: तेज तो मिल गया। लेकिन एक दिन उन्हें देखने से आज भी लोग पाप के भागी होते हैं। गणेश पुराण के द्वादश अध्याय में श्री गणेश जी द्वारा चंद्रमा को श्राप का विस्तार में वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं ‘धर्म गाथा‘ श्रृंखला में भगवान गणेश द्वारा चंद्रमा को दिए गए श्राप के बारे में…
कैलाश पर फल का विवाद और गणेश जी का क्रोध
प्राचीन काल की बात है-कैलाश शिखर पर अनेक देव, ऋषिगण, सिद्ध गणादि के साथ ब्रह्माजी भी एक उच्च आसन पर विराजमान थे । वहीं पर एक अन्य आसन पर भगवान शंकर के साथ मां पार्वती सुशोभित थी । उनके निकट ही गणपति और कुमार कार्तिकेय दोनों ही अन्य बालकों के साथ खेल रहे थे।
शिवजी के हाथ में एक दिव्य फल था, जो उन्हें नारद जी ने दिया था। इस फल को हाथ में लेकर वे सोच रहे थे कि इसे किसे दिया जाए। शिव जी के साथ मां पार्वती भी ये निर्णय ले पाने में असमर्थ थी। तब शिवजी ने ब्रह्मा जी से पूछा, तो उन्होंने विचार करके कहा कि अगर फल एक ही है तो नियमानुसार कुमार को दिया जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी वस्तु पर बड़े बालक का अधिकार पहिले पहुंचता है। ब्रह्माजी की बात सुनकर शिवजी ने वह फल कुमार को दे दिया । यह देखकर गणपति रुष्ट हो गए और सबसे ज्यादा ब्रह्मा जी पर हो गए है कि उन्होंने ऐसी व्यवस्था क्यों दे डाली? सभा समाप्त हुई । सभी देवता आदि उठ-उठ कर अपने-अपने स्थानों को चले गये । ब्रह्माजी भी अपने लोक में जा पहुंचे । वहां उन्हें सृष्टि का आरंभ करना था । जैसे ही वह आरंभ करने वाले थे, तो गणेश्वर ने विघ्न उपस्थित कर दिया । उस समय उन्होंने प्रकट होकर अपना अत्यन्त उग्र रूप दिखाया । उनके उस रूप को देखकर ब्रह्माजी डर के कारण कांपने लगे।
चंद्रमा का उपहास और गजानन का भयानक श्राप
जब चंद्रमा ने देखा कि गणपति का स्वरूप देखकर ब्रह्माजी भय से कांप रहे हैं, तो उन्हें हंसी आ गई। चंद्र देव के साथ उनके गण भी उपहास करने लगे। ऐसे में गजानन का क्रोध चंद्रमा के ऊपर बढ़ गया और इसे श्राप देते हुए कहा कि मयङ्क ! तूने इस समय मेरी हंसी उड़ा कर जो अभद्रता दिखाई है। इसका फल तुझे मिलना चाहिए।’ जा तू किसी के भी देखने के योग्य नहीं रहेगा और यदि कोई भूल से भी देख लेगा तो अवश्य ही पाप का भागी होगा।’ इतना कहकर गजमुख वहां से अंतर्धान हो गये।
कलाहीन चंद्रमा की व्याकुलता और ‘गं’ मंत्र से मुक्ति
गणेश जी के श्राप के कारण चंद्रमा का तेज खत्म हो गया और श्री हत मलिन और दीन हो गया। इससे वह बहुत व्याकुल हुआ और खिन्नता पूर्वक पश्चात्ताप करने लगा कि देखो! मैं कैसी मूर्खता कर बैठा, उन जगदीश्वर के साथ। वे प्रभु तो अणिमादि गुणों से संपन्न, संसार के कारण के भी कारण एवं महाप्रभु हैं । उनके रुष्ट होने से मैं अदर्शनीय एवं कलाहीन हो गया हूँ । अब इससे छुटकारा पाने के लिए क्या करूं?’
चंद्रमा ने लिया देवताओं का सहारा
जब चंद्रमा की समझ में कोई उपाय नहीं आया तो वह तुरंत ही देवराज इंद्र के पास गया। लेकिन इंद्र भी उन्हें नहीं देखना चाहते थे और अपनी आंखों को झुकाकर वह चंद्र से बोले कि अरे, चंद्रमा ! तुम्हारी यह दशा कैसे हुई ? क्या गजकर्ण के श्राप का ही प्रभाव है यह ? सब बात स्पष्ट कहो ।’
चंद्रमा बोले कि देवराज ! आपसे क्या छुपा है ! सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर क्यों पूछ रहे हो ? सहस्राक्ष ! अब शीघ्र ही मेरे श्राप-मुक्त होने के यत्न करो, अन्यथा समस्त संसार ही मेरे शापित होने से अशुभ फल भोगेगा। इसके बाद इंद्र ने उन्हें ब्रह्मा जी के पास जाने के लिए कहां और सभी देवगण उनके पास पहुंचे। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि इस श्राप से आपको गणेश जी ही मुक्त कर सकते हैं। ब्रह्माजी ने उन्हें सलाह दी कि केवल गणेश्वर की शरण में जाकर ही इस श्राप का निवारण हो सकता है।
गणेश जी ने दिया वरदान
श्लोक
“नमामि देवं द्विरदाननं तं यः सर्वविघ्नं हरते जनानाम्।
धर्मार्थकामांस्तनुतेऽखिलानां तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय॥”
मैं उन दो दांतों से युक्त परमेश्वर को नमस्कार करता हूं, जो अपने भक्तों के सभी विघ्नों का हरण करके तथा सभी के लिए धर्म, अर्थ और काम को प्रशस्त करते हैं। उन विघ्न-विनाशक परमात्मा गजानन को नमस्कार है। हे प्रभो ! मैंने अज्ञानवश जो अपराध किया था, उसे क्षमा करके मुझे मेरा पूर्व रूप प्रदान कीजिए। हे नाथ ! आप ही मुझे मेरा यह रूप प्राप्त करा सकते हैं। हे दया निधान ! आप सभी देवताओं के
तब भगवान गजकर्ण ने चंद्रमा की ओर कृपापूर्ण दृष्टि से देखा और मधुर मुस्कान बिखेरते हुए बोले कि सुधांशु। यह तो मैं पहले ही कह चुका था कि तुम प्रत्येक वर्ष केवल एक दिन के लिए ही अदर्शनीय रहोगे । उस दिन तुम्हें जो कोई भी जाने-अनजाने देख लेगा वही बस अभिशाप का भागी बनेगा । इस प्रकार तुम्हारी निस्तेजस्विता को ऐसे ही लोग बांट लेंगे । कृष्ण पक्ष की चतुर्थी में जो व्रत किया जाए, उसमें तुम्हारा उदय होने पर व्रत करने वाले वे लोग यदि मेरी और तुम्हारी यत्नपूर्वक पूजा करेंगे तो भी उस व्रत का फल लाभ होगा । उस दिन तुम्हारा दर्शन अवश्य करना चाहिए, अन्यथा व्रत का फल नहीं होगा।