वैशाख संकष्टी विनायक चतुर्थी व्रत कथा: पढ़ें पौराणिक कहानी, दूर होंगे सभी संकट

वैशाख संकष्टी विनायक चतुर्थी व्रत कथा: जानें भगवान गणेश से जुड़ी यह पौराणिक कहानी, व्रत का महत्व और कैसे दूर होते हैं जीवन के सभी संकट।

Published On 2026-04-19 15:13 GMT   |   Update On 2026-04-19 15:13 GMT

वैशाख संकर्षण विनायक चतुर्थी व्रत कथा: पढ़ें यह पौराणिक कहानी, दूर होंगे सभी संकट

Vaishakh Sankarshan Vinayak Chaturthi Vrat Katha: हिंदू धर्म में हर महीने आने वाली चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। वैशाख मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को संकष्टी (संकट) चतुर्थी कहा जाता है, जिसे विशेष रूप से विकट संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। यह व्रत भगवान गणेश की कृपा पाने और जीवन के सभी कष्टों को दूर करने के लिए किया जाता है।

इस दिन विघ्नहर्ता श्री गणेश की विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होने की मान्यता है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। मान्यता है कि वैशाख माह में आने वाली यह चतुर्थी विशेष रूप से मनोकामनाओं की पूर्ति और बुद्धि-विवेक में वृद्धि प्रदान करती है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर गणपति बप्पा का पूजन करते हैं और अपने जीवन में सफलता, समृद्धि एवं मंगल कार्यों की सिद्धि की कामना करते हैं। वहीं इस साल वैशाख चतुर्थी 20 अप्रैल को रखी जाएगी। वहीं इस दिन पूजा के बाद व्रत कथा पढ़ना जरूरी होता है। आइए जानते हैं विनायक चतुर्थी की व्रत कथा के बारे में…

वैशाख विनायक चतुर्थी व्रत कथा (Vaishakh Sankarshan Vinayak Chaturthi Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थे। वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिए चौपड खेलने को कहा। भगवान शंकर चौपड खेलने के लिए तो तैयार हो गए। लेकिन इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा? इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बनाया, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते हैं। परंतु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है। इसलिए तुम बताना की हम में से कौन हारा और कौन जीता। यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया। खेल तीन बार खेला गया और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गईं। खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई। और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने और किचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऐसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऐसा नहीं किया। बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई। एक साल बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं। नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालूम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए। और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए कहा। बालक ने कहा कि, हे विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों। बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अंतर्ध्यान हो गए। बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया। और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई। उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गईं। देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताए अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया। इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिए जो नाराजगी थी वो स्वयं समाप्त हो गई। पार्वती जी के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई। वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुंची। वहां पहुंचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूं। शिवजी ने गणेश व्रत का इतिहास उनसे कह दिया। यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई। यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई। माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया। व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें। कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया। विश्वामित्रजी ने व्रत करके गणेशजी से जन्म से मुक्त होकर ‘ब्रह्म-ऋषि’ होने का वर मांगा। गणेशजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की। इस प्रकार श्री गणेशजी चतुर्थी व्रत को मनोकामना व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत को करने से वो सबकी मनोकामना पूरी करते है। इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं।

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