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कुंडली क्या होती है? जन्म कुंडली कैसे बनती है और इसमें क्या देखा जाता है

जानें जन्म कुंडली क्या होती है, इसे बनाने के लिए किन जानकारियों की आवश्यकता होती है और वैदिक ज्योतिष में 12 भाव, राशियां व ग्रहों का क्या महत्व माना जाता है।

कुंडली क्या होती है? जन्म कुंडली कैसे बनती है और इसमें क्या देखा जाता है
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कुंडली क्या होती है? जन्म कुंडली कैसे बनती है और इसमें क्या देखा जाता है?

कुंडली (जन्म कुंडली) वैदिक ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है। यह व्यक्ति के जन्म के समय आकाश में ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों की स्थिति का एक ज्योतिषीय मानचित्र होती है। ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि जन्म के समय ग्रहों की स्थिति व्यक्ति के स्वभाव, शिक्षा, करियर, विवाह, स्वास्थ्य और जीवन की अन्य घटनाओं को प्रभावित करती है।

कुंडली क्या है?

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली (Birth Chart) उसके जन्म के समय आकाश में ग्रहों, राशियों और नक्षत्रों की स्थिति क्या है। इसी के आधार पर बनाई जाती है। कुंडली के द्वाराा व्यक्ति के स्वभाव, शिक्षा, करियर, विवाह, स्वास्थ्य, धन और जीवन की विभिन्न संभावनाओं के बारे में संकेत प्रदान करती है। कुंडली में 12 भाव, 12 राशियां और 9 प्रमुख ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करके ज्योतिषीय विश्लेषण किया जाता है।

कुंडली बनाने के लिए क्या आवश्यक है?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली बनाने के लिए तीन चीजें सबसे ज्यादा जरूरी है। इसी के आधार पर बनती है। इनमें थोड़ा सा भी बदलाव आपकी भविष्यफल को बदल सकता है.

कुंडली बनाने की प्रक्रिया

लग्न (Ascendant) की गणना

सबसे पहले लग्न की गणना की जाती है। इसके लिए व्यक्ति के जन्म के समय कौन सी राशि पूर्व दिशा में उद्त हो रही है। यहीं राशि लग्न कहलाती है। लग्न को ही कुंडली का पहला भाव माना जाता है।

ग्रहों की स्थिति निर्धारित करना

सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु की जन्म समय की स्थिति ज्ञात की जाती है। हर किसी के जीवन में इनकी मात्रा अलग-अलग है।

बारह भावों का निर्माण

लग्न से शुरू करके कुंडली में 12 भाव बनाए जाते हैं। प्रत्येक भाव जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है…

लग्न भाव: आपका व्यक्तित्व।

दूसरा भाव: धन, वाणी और परिवार

तीसरा भाव: साहस, पराक्रम और संचार

चौथा भाव: माता, मानसिक शांति, भूमि, भवन, वाहन, और अचल संपत्ति

पांचवां भाव: बुद्धि, संतान, शिक्षा और रचनात्मकता

छठा भाव: , शत्रु, रोग, ऋण (कर्ज), विवाद और सेवा (नौकरी)

सातवां भाव: विवाह , साझेदारी, जीवनसाथी (पति या पत्नी)

आठवां भाव: आयु, अचानक होने वाली घटनाओं, गुप्त ज्ञान और परिवर्तन

नौवां भाव: भाग्य, धर्म, और पिता

दसवां भाव: करियर, व्यवसाय, सामाजिक प्रतिष्ठा, अधिकार और पिता

ग्यारहवां भाव: आय, लाभ, इच्छाओं की पूर्ति और सफलता

बारहवां भाव: व्यय यानी खर्च, मोक्ष, विदेश यात्रा और एकांत

राशियां

राशियां के द्वारा ये पता लगाया जाता है कि कोई ग्रह किस प्रकार से व्यवहार कर रहा है। जहां ग्रह को एक किरदार और राशि उसका माहौल होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में 12 राशियों का उल्लेख है और उनके स्वभाव के आधार पर 4 भागों में बाटा गया है।

अग्नि तत्व: मेष, सिंह, धनु

पृथ्वी तत्व: वृषभ, कन्या, मकर

वायु तत्व: मिथुन, तुला, कुंभ

जल तत्व: कर्क, वृश्चिक, मीन

गणना के बाद प्रत्येक भाव में संबंधित राशि और ग्रहों को स्थापित किया जाता है। इससे जन्म कुंडली का अंतिम स्वरूप तैयार होता है।

जन्म समय क्यों महत्वपूर्ण है?

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, लग्न लगभग हर दो घंटे में बदल जता है। इसलिए जन्म के समय में कुल मिनटों का अंतर होने से कुंडली और उसमें मौजूद फलादेश में काफी अधिक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए आपको अपने जन्म का सटीक समय पता होना बेहद जरूरी है।

जन्म कुंडली का शास्त्रीय आधार

जन्म कुंडली के निर्माण और ग्रहों के फलों के बारे में बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका, जातक पारिजात और बृहत् जातक विस्तार से बताया गया है।

बृहत् पाराशर होरा शास्त्र

महर्षि पराशर द्वारा रचित इस ग्रंथ में वैदिक ज्योतिष को मूल आधार माना गया है। इसमें ग्रहों के स्वबाव, राशियां, बाव, दशाओं, राजयोग, योग से लेकर विभिन्न ज्योतिषीय सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस समय ज्योतिष में उपयोग होने वाली विम्शोत्तरी दशा प्रणाली का प्रमुख स्रोत भी इसी ग्रंथ में मिलती है।

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