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मोहिनी एकादशी 2026: तिथि, भद्रा काल, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत नियम

मोहिनी एकादशी 2026 कब है? जानें सही तिथि, भद्रा काल, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत नियम। भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए इस दिन का महत्व और पारण समय विस्तार से पढ़ें।

मोहिनी एकादशी 2026: तिथि, भद्रा काल, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत नियम

Mohini Ekadashi 2026 Date, Bhadra Time & Puja Vidhi: हिंदू धर्म में मोहिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित सबसे पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से पापों से मुक्ति, मानसिक शांति और समृद्धि के लिए रखा जाता है। यह एकादशी भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार को समर्पित होती है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। इस साल मोहनी एकादशी का व्रत 27 अप्रैल को रखा जाएगा। लेकिन इस दिन सुबह से ही भद्रा लग रही हैं। ऐसे में भगवान विष्णु की पूजा को लेकर संशय बना हुआ है। आइए जानते हैं भगवान विष्णु की पूजा का शुभ मुहूर्त और नियम…

मोहिनी एकादशी 2026 कब है?

पंचांग के अनुसार

व्रत तिथि: 27 अप्रैल 2026 (सोमवार)

एकादशी तिथि प्रारंभ: 26 अप्रैल 2026 शाम 6:06 बजे

एकादशी तिथि समाप्त: 27 अप्रैल 2026 शाम 6:15 बजे

उदया तिथि के अनुसार 27 अप्रैल को व्रत रखा जाएगा।

भद्रा काल (Bhadra Time)

ज्योतिष के अनुसार भद्रा काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है।

मोहिनी एकादशी 2026 के दिन

भद्रा का प्रभाव मुख्य पूजा समय में नहीं पड़ता

इसलिए दिन में पूजा करना शुभ रहेगा

सामान्य नियम:

भद्रा में विवाह, पूजा या शुभ कार्य टालना चाहिए

(नोट: भद्रा का समय स्थान अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखना बेहतर रहता है)

शुभ मुहूर्त और पारण समय

पूजा का श्रेष्ठ समय: सुबह (सूर्योदय के बाद)

पारण (व्रत खोलने का समय):

28 अप्रैल 2026 सुबह 5:43 AM

सही समय पर पारण करना व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है

मोहनी एकादशी व्रत नियम

मोहिनी एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को इस दिन सुबह जल्द उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और भगवान विष्णु भगवान का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। वहीं व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखनी चाहिए। इसलिए झूठ बोलने, क्रोध करने और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। वहीं ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस दिन अन्न का त्याग कर फलाहार या निर्जल व्रत रखा जाता है, हालांकि स्वास्थ्य के अनुसार फल, दूध या जल ग्रहण किया जा सकता है। पूरे दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जप, कथा श्रवण और भजन-कीर्तन करना शुभ माना जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि में प्रातः स्नान के बाद पूजा कर विधि अनुसार व्रत का पारण करना चाहिए और जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

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