होलिका दहन 2026: सही तारीख, शुभ मुहूर्त, भद्रा समय, पौराणिक कथा और क्यों मनाया जाता है यह पर्व?
होलिका दहन 2026 का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर 2–3 मार्च की रात्रि में मनाया जाएगा, जबकि रंगों वाली होली 4 मार्च 2026 को खेली जाएगी। पंचांग के अनुसार 2 मार्च को भद्रा काल रहेगा, जिसमें होलिका दहन नहीं किया जाता, लेकिन भद्रा पुच्छ के समय दहन करना शुभ माना जाता है। इस वर्ष भद्रा पुच्छ 2 मार्च रात 11:54 बजे से 3 मार्च 01:27 बजे तक रहेगा। इसके अतिरिक्त 3 मार्च सुबह 5:30 से 6:45 बजे तक भी शुभ समय उपलब्ध है। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और इसकी पौराणिक कथा भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप और होलिका से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद अग्नि से सुरक्षित बच गए और अहंकारी होलिका जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है।

होलिका दहन 2026: तारीख, शुभ मुहूर्त, इतिहास और क्यों मनाया जाता है?
Holika Dahan 2026 Date : होलिका दहन — बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक — हिन्दू धर्म का एक प्रमुख धार्मिक उत्सव है। यह त्योहार हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा के ठीक पहले संध्या (शाम) को मनाया जाता है, और अगली सुबह ही रंगों वाला दिवा-होली मनाई जाती है। Holika Dahan बुराई, अहंकार और नकारात्मक शक्तियों का दहन करने का पौराणिक अनुष्ठान माना जाता है।
रंगों की होली खेलने से एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग लकड़ियों और उपले से होलिका तैयार करते हैं और शुभ मुहूर्त में अग्नि प्रज्वलित कर पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भक्त प्रह्लाद को जलाने वाली होलिका स्वयं अग्नि में जल गई थी, जिसके कारण यह पर्व मनाया जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं होलिका दहन 206 की तिथि, शुभ मुहूर्त और इससे जुड़ी पौराणिक कथा।
होलिका दहन की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार 2 मार्च को भद्रा पूरे दिन रहेंगी और भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जाता है। लेकिन भद्रा पुच्छ में होलिका दहन कर सकते हैं। ऐसे में भद्रा का पुच्छ 2 मार्च 2026, सोमवार को रात में 11 बजकर 54 मिनट से रात्रि 01 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। इस दौरान होलिका दहन कर सकते हैं। इसके अलावा 3 मार्च को सुबह 5:30 से 6:45 के बीच होलिका दहन कर सकते हैं।
होलिका दहन की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक एक अत्याचारी असुर राजा था, जिसे अपने पुत्र प्रह्लाद की भगवान विष्णु में अटूट आस्था स्वीकार नहीं थी। हिरण्यकश्यप चाहता था कि पूरा संसार, यहां तक कि उसका पुत्र भी, केवल उसी को ईश्वर माने। लेकिन प्रह्लाद ने किसी भी परिस्थिति में भगवान विष्णु की भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार से मृत्यु दंड देने का प्रयास किया, लेकिन हर बार ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। अंत में उसने अपनी बहन होलिका का सहारा लिया, जिसे यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती। योजना के अनुसार, होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन दैवी कृपा से प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ और होलिका स्वयं जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि अंततः सत्य और भक्ति की विजय होती है और अहंकार व अधर्म का विनाश निश्चित है।
होलिका दहन की परंपरा की शुरुआत
होलिका दहन की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसे अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व नकारात्मक शक्तियों के अंत और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का संदेश देता है। इस शुभ अवसर पर लोग होलिका की परिक्रमा कर अपने परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन के बाद बची हुई राख को अत्यंत पवित्र माना जाता है। कई लोग इस राख को अपने घर लाकर माथे पर तिलक के रूप में लगाते हैं, जिससे बुरी नजर और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा होती है। यही कारण है कि होलिका दहन को आस्था, विश्वास और शुभता से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

