दशा माता की कथा: पीपल पूजा से कैसे बदली रानी दमयंती की किस्मत, जानें व्रत का महत्व

Dasha Mata Vrat Katha 2026: हिंदू धर्म में दशा माता व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को रखा जाता है और इस दिन माता पार्वती के दशा माता स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार दशा माता व्रत के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा करने और 10 गांठ वाला सूत बांधने से जीवन की खराब दशा सुधरती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन दशा माता की कथा सुनना या पढ़ना अनिवार्य माना गया है। जानें राजा नल और रानी दमयंती से जुड़ी दशा माता व्रत कथा, पीपल पूजा का महत्व और व्रत का धार्मिक फल।

Published On 2026-03-12 16:56 GMT   |   Update On 2026-03-12 16:56 GMT

दशा माता की कथा: पीपल पूजा से कैसे बदली रानी की किस्मत

दशा माता व्रत के दिन पूजा के साथ दशा माता की कथा सुनना या पढ़ना बहुत जरूरी माना जाता है। मान्यता है कि इस कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से घर की खराब दशा सुधारने और सुख-समृद्धि पाने के लिए किया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रतिवर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को दशा माता का व्रत रखा जाता है। इस दिन 13 मार्च 2026 को पड़ रहा है। माता दशा को मां पार्वती का रूप माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं माता दशा की विधिवत पूजा करने के साथ 10 गांठ वाला सूत के धागे से बना माला पीपल के वृक्ष पर अर्पित करती हैं और पूजा के बाद इसे गले में पहन लेती हैं। इस दिन दशा माता की पूजा करने से सुख-समृद्दि, धन -संपदा और खुशहाली की प्राप्ति होती है। दशा माता की विधिवत पूजा करने के साथ इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए।

दशा माता व्रत 2026 तिथि (Dasha Mata Vrat 2026 Date And Time)

पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि 13 मार्च 2026 की सुबह 6 बजकर 28 मिनट से आरंभ होगा, जो 14 मार्च 2026 की सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगा। ऐसे में दशा माता का व्रत 13 मार्च, दिन शुक्रवार को रखा जाएगा।

दशा माता व्रत कथा

प्राचीन समय में राजा नल और रानी दमयंती नाम के राजा-रानी रहते थे। दोनों का जीवन सुख-समृद्धि से भरा हुआ था। रानी दमयंती रोज भगवान की पूजा करती थीं और चंदन व मौली चढ़ाकर परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती थीं।

एक दिन रानी ने पूजा के बाद बची हुई मौली अपने गले में धारण कर ली। यह देखकर राजा नल को क्रोध आ गया और उन्होंने वह धागा तोड़कर फेंक दिया। इसके बाद धीरे-धीरे उनके राज्य में दुर्भाग्य आने लगा—राज्य छिन गया, धन-सम्पत्ति खत्म हो गई और दोनों को कष्ट झेलने पड़े।

कुछ समय बाद रानी को एक साध्वी महिला मिली, जिसने उन्हें दशा माता व्रत और पीपल की पूजा करने की सलाह दी। रानी ने श्रद्धा से व्रत रखा, पीपल वृक्ष की पूजा की और दशा माता से प्रार्थना की।

माता की कृपा से धीरे-धीरे उनकी खराब दशा सुधरने लगी। राजा को फिर से राज्य मिला और उनका जीवन पहले की तरह सुखी हो गया।

पीपल पूजा का महत्व

दशा माता व्रत में पीपल, नीम और बरगद (त्रिवेणी) की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। व्रती महिलाएं पीपल के पेड़ के चारों ओर धागा बांधकर परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। दशा माता की पूजा और व्रत कथा पढ़ने से जीवन की खराब दशा सुधरती है, घर में सुख-समृद्धि आती है और परिवार पर देवी की कृपा बनी रहती है।

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